माया सरकार को करारा झटका: जेल के लिए किया गया भूमि अधिग्रहण रद्द
Sabhar Dainik Bbhaskar
नोयडा/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने करारा झटका दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार के जिला कारागार के लिए निजी भूमि अधिग्रहण के फैसले को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एचएल दत्तू की पीठ ने कहा कि राज्य ने जमीन मालिकों की आपत्ति और उनकी शिकायतों को सुने जाने के बहुमूल्य अधिकार से वंचित कर भूमि अधिग्रहण करने की गंभीर भूल की। बता दें कि राज्य सरकार ने इस मामले में भूमि अधिग्रहण के लिए ‘आपात-उपबंध’ का सहारा लिया था। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा-17 के तहत आपात प्रावधान का इस्तेमाल सरकार ने बेहद ढीले-ढाले तरीके किया, जबकि राज्य के पास आपत्ति आमंत्रित करने और जमीन मालिकों की शिकायतों को दूर करने की सामान्य प्रक्रिया अपनाने के लिए पर्याप्त समय था। धारा-17 सरकार को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए असंतुष्ट भू-स्वामियों से आपत्ति मंगाए बिना निजी भूमि का अधिग्रहण करने की शक्ति देती है। न्यायमूर्ति दत्तू ने अपने फैसले में कहा कि घटनाक्रम सरकार की सुस्ती और ढीले-ढाले रवैये को बताते हैं। उन परिस्थितियों के मद्देनजर प्रतिवादी अधिनियम की धारा-17 को लागू करने में सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित जिले के डीएम ने 24 जनवरी, 2003 को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रधान सचिव गृह (कारा) को प्रस्ताव भेजा था। लेकिन, पांच साल बीतने के बाद 2008 में राज्य सरकार ने डीएम से कहा कि वह भूमि अधिग्रहण के लिए उपयुक्त भूमि की उपलब्धता का पता लगाएं। इसके बाद सरकार ने आपात प्रावधान लागू किए। असंतुष्ट भू-मालिकों देवेंद्र सिंह और अन्य ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। फिर, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत को इस तथ्य पर गौर करना चाहिए आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक या सांस्थानिक क्षेत्रों के विकास जैसे कुछ सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए योजना और इसे लागू करने की जरूरत होती है। इसमें आम तौर पर कुछ वर्ष लग जाते हैं। पीठ ने कहा, ‘इसलिए उस सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिनियम के तहत आपात प्रावधानों का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।’
नोयडा/नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने करारा झटका दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार के जिला कारागार के लिए निजी भूमि अधिग्रहण के फैसले को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति एचएल दत्तू की पीठ ने कहा कि राज्य ने जमीन मालिकों की आपत्ति और उनकी शिकायतों को सुने जाने के बहुमूल्य अधिकार से वंचित कर भूमि अधिग्रहण करने की गंभीर भूल की। बता दें कि राज्य सरकार ने इस मामले में भूमि अधिग्रहण के लिए ‘आपात-उपबंध’ का सहारा लिया था। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा-17 के तहत आपात प्रावधान का इस्तेमाल सरकार ने बेहद ढीले-ढाले तरीके किया, जबकि राज्य के पास आपत्ति आमंत्रित करने और जमीन मालिकों की शिकायतों को दूर करने की सामान्य प्रक्रिया अपनाने के लिए पर्याप्त समय था। धारा-17 सरकार को सार्वजनिक उद्देश्य के लिए असंतुष्ट भू-स्वामियों से आपत्ति मंगाए बिना निजी भूमि का अधिग्रहण करने की शक्ति देती है। न्यायमूर्ति दत्तू ने अपने फैसले में कहा कि घटनाक्रम सरकार की सुस्ती और ढीले-ढाले रवैये को बताते हैं। उन परिस्थितियों के मद्देनजर प्रतिवादी अधिनियम की धारा-17 को लागू करने में सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित जिले के डीएम ने 24 जनवरी, 2003 को उत्तर प्रदेश सरकार के प्रधान सचिव गृह (कारा) को प्रस्ताव भेजा था। लेकिन, पांच साल बीतने के बाद 2008 में राज्य सरकार ने डीएम से कहा कि वह भूमि अधिग्रहण के लिए उपयुक्त भूमि की उपलब्धता का पता लगाएं। इसके बाद सरकार ने आपात प्रावधान लागू किए। असंतुष्ट भू-मालिकों देवेंद्र सिंह और अन्य ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। फिर, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत को इस तथ्य पर गौर करना चाहिए आवासीय, वाणिज्यिक, औद्योगिक या सांस्थानिक क्षेत्रों के विकास जैसे कुछ सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए योजना और इसे लागू करने की जरूरत होती है। इसमें आम तौर पर कुछ वर्ष लग जाते हैं। पीठ ने कहा, ‘इसलिए उस सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिनियम के तहत आपात प्रावधानों का इस्तेमाल करना उचित नहीं है।’


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